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संपादकीय कलम: केरल का संकट – ‘ईश्वर का अपना देश’ बन रहा ‘नशे का अपना प्रदेश’


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संपादकीय कलम: केरल का संकट – ‘ईश्वर का अपना देश’ बन रहा ‘नशे का अपना प्रदेश’


संपादकीय कलम: केरल का संकट – ‘ईश्वर का अपना देश’ बन रहा ‘नशे का अपना प्रदेश’

संपादक की मेज से | 31 मार्च, 2025

केरल को लंबे समय से “ईश्वर का देश” के रूप में ही जाना जाता रहा है। वह राज्य जो शांत झीलों, हरे-भरे वनों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इस मनोरम सतह के नीचे एक चिंताजनक परिवर्तन निरंतर चल रहा है, जो चिंताजनक और चौकाने वाला है। जो कभी प्राकृतिक सुंदरता और प्रगतिशील विचारों का पर्याय था, वह अब चुपचाप एक काले अँधेरे के तले सरकता जा रहा है: शायद आगे चलकर कहा जाये “नशे का प्रदेश” तो यह अतिशयोक्ति नहीं है। क्योंकि समय के साथ यह एक कठोर वास्तविकता है जो राज्य के कक्षाओं, छात्रावासों और सड़कों से निरंतर गुजर कर फ़ैल रही है।

इसकी चेतावनी अब सिर्फ दूर की सुर्खियों से ही नहीं, बल्कि भीतर की आवाजों से भी आ रही है। डॉ. दीपेश दिवाकरण (डॉ. डीडी) ने हाल ही में लिंक्डइन पर एक ठंडक पैदा करने वाला अनुभव साझा किया: पोस्ट के आधार पर एक 19 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र ने उन्हें एमडीएमए, जिसे “लूसी” कहते हैं, वह बनाने का तरीका बताया। जब उससे पूछा गया की कैसे किया तो उसने चौकाने वाला जवाब दिया, जो था की उसने गूगल और चैटजीपीटी से प्राप्त व्यंजनों से सीखा था। उसने आगे यह भी बताया की “हमारे प्रोफेसर भी इसका इस्तेमाल करते हैं,” । ज़रा रुकिए और सोचिये की यह कोई अपराध धारावाहिक का दृश्य नहीं था, यह सब केरल के एक टियर-2 कॉलेज में चलता हुआ पाया गया है।

शायद यह एक किस्स्सा नहीं है जो इसकी बयानी करता है, इसकी संख्याएँ और भी भयावह चित्र प्रस्तुत करती हैं। पिछले एक दशक में, नशे का व्यापार केरल के सामाजिक ताने-बाने में गहराई तक पैर पसार कर चुका है। अनुमान बताते हैं कि 4,50,000 से अधिक युवा राज्य में नशे की चपेट में हैं, जो जाने अनजाने ₹1 लाख करोड़ से अधिक के काले बाजार को बढ़ावा दे रहे हैं। केवल एक महीने में, समाचारों ने एर्नाकुलम कॉलेज छात्रावास में 2 किलोग्राम गांजा, अंगमाली में 400 ग्राम एमडीएमए और 2023 में केरल तट से ₹12,000 करोड़ मूल्य के एमडीएमए की जब्ती की सूचना भी दी। इस जाल के पीछे खोजा तो यह सब एक पाकिस्तानी मूल के जहाज से पकड़ा गया। आप सोचिये की यदि इतना पकड़ा गया है, तो कितना छूट गया होगा? वह नंबर क्या हो सकते है?

इस संकट की पहुँच हर एक और पुरे देश को चौंका देने वाली है। नशा अब छायादार गलियों तक सीमित नहीं है, इसकी सीमाएं अब कक्षाओं, खेल के मैदानों, कोचिंग सेंटरों और कैफे तक फैलती जा रही है। कुछ लोग बताते है की किशोरों द्वारा किराए के अपार्टमेंट वितरण केंद्र बन गए हैं। 17 साल के छात्र टेलीग्राम चैनलों और इंस्टाग्राम डीएम में नशे के व्यापार पर चर्चा करते हैं, जैसे कि यह कोई व्यापार या देश के लिए आवश्यक विकास के लिए स्टार्टअप योजना हो। वे एक दुसरे को समझाते है की – “भाई, 100 ग्राम से कम रखो।” उन्होंने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज (एनडीपीएस) अधिनियम की कमजोरियों को भी अच्छे तरीके से समझ लिया है, क्योंकि इस तरह कही भी “छोटी मात्रा” के साथ पकड़े जाने पर भी जमानत मिल सकती है। कानून का ज्ञान उनकी ढाल नहीं बन रहा लेकिन, यही ज्ञान उनके लिए फैलाव की उनकी रणनीति है।

मौन में डूबा समाज

अब सवाल यह आ रहा है की, यह महामारी किस कारण बढ़ रही है? जवाब है उदासीनता, जो कानूनी खामियों और गलत प्राथमिकताओं के जहरीले मिश्रण में छिपा हुआ प्रवाह है। एक तरफ केरल सरकार “सर्वश्रेष्ठ स्टार्टअप राज्य” जैसे पुरस्कारों में रम रही है, वहीं युवा असुरक्षित छोड़ दिए गए हैं। इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्रालय की चुप्पी असहज सवाल उठाती है। क्या इसको राजकीय पार्टी द्वारा दबाया जा रहा है या केंद्र भी सीमे मौन साध रही है या अनजान है? या फिर क्या यह एक सोची-समझी अनदेखी है। एक राजनीतिक गुट को कमजोर करने के लिए या कुछ गुट के दबाव में आकर पूरी पीढ़ी को बलि चढ़ा देना थी है? या फिर जैसा की कुछ लोग दावा करते हैं कि नशा राजनीतिक एजेंडों के लिए धन का नया स्रोत बन गया है? यदि यह सच है, तो यह संकट नहीं, राज्य के लोगो और देश की जनता के साथ भी विश्वासघात है।

केरल के अंदर और अन्य राज्यों में भी बढ़ रहे इस तरह के युवा में प्रभावित और प्रचलित होते नशे के कारण, दाँव पर बहुत कुछ है। केरल के वे युवा जो कभी राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति माने जाते थे, अब सबसे अधिक खतरे में उन्हें देखा जा रहा हैं। जल्द ही माता-पिता, शिक्षकों और समुदायों को इसका सामना करना होगा। लेकिन मौन वह जगह है, जहाँ नशे की लत पनपती है और केरल बहुत शांत हो गया है।

खतरे के संकेत और क्या होना चाहिए ?

जागरूकता पुनर्जनन का पहला कदम है। हर माता-पिता, अभिभावक और नागरिक इन सब से बचने के लिए यह कर सकते हैं:

  • बैग की जाँच करें: अपने बच्चे के स्कूल या कॉलेज के सामान की नियमित जाँच करें। अगर वह चौकाने वाले तरीके से बर्ताव करे तब भी कोई बहाना न सुने।
  • तकनीक पर नजर रखें: यदि उनके पास फोन है, उसकी जिम्मेदारी अपने उपर लें। अगर वर्तन विचित्र होता जा रहा है तो गोपनीयता सुरक्षा से पीछे हटती है।
  • भाषा समझें: “लूसी” “मॉली” “स्नो” या “स्कूबी स्नैक्स” जैसे शब्द मासूम नहीं हैं। इस तरह के शब्द सामान्य नहीं है, इन्हें समजे यह संदेहात्मक वर्तन के संकेत हैं।
  • संकेतों पर ध्यान दें: अलग-थलग व्यवहार, भोजन छोड़ना, ताले लगे दरवाजे, या अचानक रात की सैर खतरे का संकेत हैं। बिना बताये और छुपते छुपाते होने वाली हरकते।
  • प्रभावकों पर सवाल उठाएँ: शिक्षक या सहपाठी जो अत्यधिक परिचित लगें, उन पर नजर रखें। क्योंकि, यह सब प्रभाव में आने के बाद होने वाले कार्य है।

यह आर्टिकल न तो डर फैलाने के बारे में है और किसी सरकार की आलोचना के लिए भी नहीं है। यह देश के हित को देखते हुए एक नैतिक जवाबदेही के बारे में है। केरल का भविष्य इस मंडराती हुई काली छाया को चुनौती देने की उसकी क्षमता पर निर्भर करता है, इससे पहले कि यह युवा के भविष्य रूपी प्रकाश को निगल ले। क्योंकि यह केरल तक सिमित नही है और रहेगा भी नहीं।

केरल से परे: एक राष्ट्रीय आत्ममंथन

कोई भी जाल न एक केंद्र में होता है न वह केंद्र से नियंत्रित होता है। यह समस्या भी सिर्फ केरल की कहानी मात्र नहीं है। यह एक व्यापक और राष्ट्रिय तौर पर फ़ैल रही सामाजिक चुनौती का प्रतिबिंब है। ज्ञान के भी दो पहलु होते है जब उसके जानकर के व्यक्तित्व में मिलावट या लालच आ जाये। ज्ञान और तकनीक सकारात्मक प्रभाव भी बनाती है और उसके नकारात्मक पहलु भी आवश्य बनते है। पिछले दशक में जो तकनिकी विकास हुआ हे वहा कई निष्कर्ष बनते है या संभवित होते है। हम समय के उस दौर पर है – जहाँ तकनीक नवाचार और विनाश दोनों को सशक्त बनाती है, जहाँ कानून इरादों से पीछे रह जाते हैं और जहाँ लाभ अक्सर नैतिकता पर भारी पड़ता है। डॉ. डीडी का पोस्ट केवल एक शोक नहीं है; यह एक नैतिक पुकार है। इसे दोबारा साझा करें, इस पर चर्चा करें, असहमत भी हों यदि यह जरूरी हो – लेकिन इसे नजरअंदाज न करें। यह घातक है और विनाशक भी है।

सवाल यह नहीं है कि क्या केरल अपनी आत्मा को वापस पा सकता है या नहीं? सवाल यह है कि क्या हम, एक समाज के रूप में, “ईश्वर का देश” से “नशे का देश” बनने से पहले कोई सख्त एक्सन प्लान बनाकर कमर कसने का साहस रखते हैं। आपके विचार मायने रखते हैं – उन्हें साझा करें।

स्रोत: डॉ. दीपेश दिवाकरण (डॉ. डीडी) के लिंक्डइन पोस्ट से अनुकूलित।

निचे कुछ अन्य आर्टिकल के लिंक भी सामिल है, जी इस को दर्शाते है।


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