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વીર અભિમન્યુ અને ચક્રવ્યૂહ

અભિમન્યુએ જતાં જતાં આપણને એ શીખવાડી ગયો કે પરિસ્થિતિ કેટલી પણ પ્રતિકુળ કેમ ના હોય, માણસે ધૈર્ય સાથે એનો સામનો કરવો જોઈએ. આ સંસારમાં માત્ર કોઈ યુદ્ધ જીતવાને જ શ્રેષ્ઠતા નથી કહેવાતી, યુદ્ધમાં પોતાની કળા બતાવનારને જ સંસારમાં સન્માનની નજરે જોવામાં આવે છે.

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ઉરુભંગ – મહાકવિ ભાસ

ઉરુભંગ પ્રસિદ્ધ મહાકાવ્ય મહાકાવ્ય મહાભારતથી કૈંક ભિન્ન છે, જયારે મૂળ ગ્રંથમાં દુર્યોધનને અતિ ખરાબ ચીતરાયો છે. આજ દુર્યોધન ઉરુભંગમાં એક નવા અવતારમાં જોવાં મળે છે

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માણેકશૉ : જો હું પાકિસ્તાનમાં હોત તો…

જો કોઈ માણસ એમ કહેતો હોય કે તે મોતથી નથી ડરતો તો કાં તો એ જુઠ્ઠુ બોલે છે કાં એ ગુરખો છે. -સામ માણેકશા (ગોરખા રેજિમેન્ટની કમાન સંભાળનારા તેઓ પહેલા ભારતીય અધિકારી હતા.

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૨ ઓક્ટોબર – જેની એક બાજુ આજ પણ રહસ્યમયી છે

ગાંધી જયંતિ સિવાય  ૨ ઓક્ટોબરના દિવસે શુ છે એ કોઈને કદી શીખવવામાં જ નથી આવ્યું. પાછળના કેટલાક દિવસોથી આ તરફ પ્રજાનું ધ્યાન દોરવામાં આવી રહ્યું છે.

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महाभारत : पांडवो का वनवास और अज्ञातवास

जब से इन्द्रप्रस्थ भोज के लिए कौरव और सबको आमंत्रित किया गया था, तब से ही इन्द्रप्रस्थ की चकाचोंध देखकर दोर्योधन हक्काबक्का सा रह गया था। खांडववन को इन्द्रप्रस्थ बनाया जा सकता था इसकी कल्पना भी शायद दुर्योधन ने नही की थी।

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महाभारत : इन्द्रप्रस्थ की स्थापना

लाक्षागृह षड्यंत्र के बाद पुरे भारत वर्ष में पांडवो के मृत्यु के समाचार फेल चुके थे। दुर्योधन और शकुनी भी इसी बात से निश्चिंत थे, तब तक जब तक द्रौपदी का स्वयंवर नही हुआ।

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महाभारत : द्रौपदी स्वयंवर

महाभारत कई पर्वो और प्रसंगों का साक्ष्य रहा हे। कुछ इसी प्रकार इसका प्रवाह भी इसी तरह बदलता संभलता रहा हे। लाक्षागृह वाले प्रसंग के बाद जो नया अध्याय पांडवो के जीवन में शुरू होने वाला था,

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महाभारत : लक्ष्याग्रह षडयंत्र

दुर्योधन कतई यह नहीं चाहता था कि युधिष्ठिर हस्तिनापुर का राजा बने, अतः उसने अपने पिता धृतराष्ट्र से कहा की “पिताजी यदि एक बार युधिष्ठिर को राज सिंहासन प्राप्त हो गया, तो यह राज्य सदा के लिये पाण्डवों के वंश का हो जायेगा

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महाभारत : एकलव्य कि गुरुभक्ति

एकलव्य को सदा ही एक उपेक्षित शिष्य के स्वरूप इतिहास यद् करता आया हे। यहाँ तक की आज भी हम शिक्षा के कई तरह के वार्तालाप के दरमियान एकलव्य और गुरु द्रोण के द्रष्टांत दर्शाते रहेते हे।

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महाभारत : कर्ण का जन्म

कर्ण का लालन पालन बड़े स्नेह में होता रहा। उसका एक छोटा भाई भी था, जो कर्ण के बाद राधा की कोख से जन्मा था। कुमार अवास्था से ही कर्ण की रुचि अपने पिता अधिरथ के समान रथ चलाने कि बजाय युद्धकला में अधिक थी। उसने इसी वजह से युध्ध कला में अभ्यास शुरू किया।

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महाभारत : पाण्डु बने हस्तिनापुर के राजा

ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, हे कुन्ती अब लगता हे की मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है। क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता। क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?