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मेरी चुप्पीमें झाँखकर देख

मेरी चुप्पीमें झाँखकर देख तो छुपा हुवा इकरार निकले,
मेरा दिल खोलकर देख जरा तो इश्क का दरबार निकले

तू चाहे अगर तो बनकर मंज़िल तेरे द्वार तक चले आयेंगे,
शर्त बस यही के मेरा नाम तेरे सजदे मे बार बार निकले

अब तो जिगर के अंदर ही चुप रहती हु मेरे जाने-हयात,
मेरी रूह को तू छूले अगर तो चाहत की झंकार निकले

नगीने जैसी चमक उठूँगी, एकबार इन आखोंमे देख लें,
फिर तु जब भी अपनी आंखे खोले, मेरा ही दिदार निकले

पलपल घूमती है तेरी यादें पडछाई बनकर मेरे इर्दगिर्द,
कोई खोले जो दिल मेरा तेरी ही यादोंका उपहार निकले

दिलको दिलसे मिलने की बेसब्री बड़ी है युगो युगो से,
हर अघूरी मुलाकात के बाद मिलन का इंतेजार निकले

तुम अगर आना चाहो तो पुकारलो वही कही दूरसे ही,
हम गुम है तेरी यादोंके सायें तले, यही इस्तेहार निकले

~ रेखा पटेल ‘विनोदिनी’

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