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महाभारत : कुरु वंश की उतपत्ति

महाभारत भारतीय पौराणिक काल का वह प्रसंग हे जिसका महात्म्य आज भी लोगो के जीवन में आमतोर पर देखा जाता हे। अगर इस बात को सहज शब्दों में कहा जाये तो हर व्यक्ति अपने जीवन काल दरमियाँ इन्ही प्रसंगो से गुजरता हे, जो प्रसंग महाभारत दर्शाता हे। महाभारत हमे जीवन के विभिन्न पहेलुओ से अवगत कराता हे और साथ ही साथ यह भी सिखाता हे की अगर उन प्रसंगो में सावधानी न बरती जाय तो रिश्ते और शांति दोनों का विनाश निर्धारित हो जाता हे। आईए आज से शुरू होने वाली महाभारत कथा का प्रारम्भ करते हे।

पुराणो के अनुसार अगर महाभारत के इतिहास को बारीकी से देखा जाए तो वहा ऐसा बहोत कुछ मिलता है जो हम नही जानते है। या फिर ये कहे कि हम तो सिर्फ उतना ही जानते है जितना कि हमने सुना है। लेकिन महाभारत में बहोत कुछ ऐसा है जो हमे जानना चाहिए। महाभारत की शुरुआत शान्तनु से बताई गई है, लेकिन इससे आगे की बाते कुछ इस प्रकार है। महाभारत के इतिहास में ब्रह्मा जी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ है। पुरूरवा से आयु, आयु से राजा नहुष, और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए थे। फिर ययाति से पुरू हुए। पूरू के वंश में भरत (कहा जाता है कि उस समय पूरे भारत को भारत वर्ष कहा जाता था। और हमारे देश का नाम भी इन्ही भरत राजा के नाम से माना जाता है।) और फिर उन्ही भरत के कुल में महान राजा कुरु हुए। ओर शायद इन्ही महाराजा कुरु के नाम का कारण रहा है, जिससे की यह पूरा वंश ही पुरु वंश से कुरु वंश कहलाया। आज भी वर्तमान समय मे देखे तो लोग इस इतिहास में कौरव वंश को कुरु वंश से ही याद करते है। और यही उनकी वास्तविक और पौराणिक पहचान भी बन चुकी है।

वेसे शांतनु से पहेले अगर देखे तो हमारे पास दुष्यंत और शकुंतला का प्रसंग हे। इन्ही की संतान भरत थी, जिनके नाम पर पूरा देश भारत वर्ष कहा जाता हे।

दुष्यंत – शकुंतला

उस समय काल में एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में चले गये। जिस वन में वे शिकार के लिये चले थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम भी स्थित था। कण्व ऋषि के दर्शन करने के विचार को लिये महाराज दुष्यंत शिकार से पहले ही उनके आश्रम पर पहुँच गये। आश्रम पहोचकर उन्होंने तुरंत कण्व ऋषि को पुकार लगाई। लेकिन पुकार लगाने पर भी कण्व ऋषि बाहर न आए, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर उनका स्वागत किया। उस कन्या ने राजा दुष्यंत से कहा की, ‘हे राजन् महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु कण्व ऋषि के आश्रम में आपका स्वागत है।’

उस कन्या को देख राजा दुष्यंत सोंदर्य की परिकल्पना में खो गए। लेकिन फिर उन्होंने बात को आगे बढ़ाते हुए उस कन्या का परिचय पूछा। उस कन्या ने अपना परिचय कण्व ऋषि की पुत्री के रूप में ही दिया। जबकि आश्चर्य से भरे महाराज दुष्यंत ने तुरंत जहा उनसे पूछ लिया की, ‘मेरा ज्ञान कहेता हे की महर्षि तो आजन्म ब्रह्मचारी है, फिर आप उनकी पुत्री…?’

यह बात सुनकर उस कन्या ने अपना वास्तविक परिचय दिया। फिर दुष्यंत को वास्तविकता का ज्ञान हुआ। वास्तव में शकुन्तला मेनका ओर विश्वामित्र की संतान थी। जब मेनका विश्वामित्र का तपो भंग करने धरती लोक आयी थी तभी इस बालिका का जन्म हुआ था। लेकिन मेनका ने पुत्री जन्म के साथ ही उसे वन में छोड़ दिया था, जहा शकुन्त नामक पक्षी द्वारा उसकी रक्षा हुई। इसी कारण उस बालीका का नाम शकुन्तला रखा गया। कण्व ऋषि की जैसे ही उस पर द्रष्टि पड़ी थी, वे उसे बिना संकोच अपने आश्रम में ले आये। और फिर वहीँ आश्रम में शकुन्तला का भरण पोषण हुआ। ओर शास्त्रो के आधार पर जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला – ये तीनों पिता ही कहे जाते हैं। इस प्रकार शकुन्तला ने कहा कण्व ऋषि ही मेरे पिता हुये।

शकुन्तला के इन वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, शकुन्तले तुम्हारी बताई बात के आधार पर तुम एक क्षत्रिय कन्या हो। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ। महाराज दुष्यंत भी युवान थे, ओर शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत को देखकर उन पर मोहित हो चुकी थी। इन्ही कारणों से उसने महाराज दुष्यंत को विवाह के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी।

शकुन्तला ओर महाराज दुष्यंत की सहमति के साथ दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। उसके बाद कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से विदा लेकर वापस हस्तिनापुर लॉट आये। वन से लौटते वक्त दुष्यंत ने शकुन्तला से कहा था कि मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। में ज्यादा दिन यहाँ रुक नही शकता, ओर कण्व ऋषि की आज्ञा के बिना तुम्हे यहा से लेकर भी नही जा शकता। इसी कारण हमे कण्व ऋषि के आने तक प्रतीक्षा करनी होगी। और जब महर्षि कण्व तीर्थ यात्रा से लौट आए, उसी दिन तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन ले चलूंगा।

महाराज दुष्यंत ने राजमहल लोटते समय शकुन्तला को वचन दिया, ओर अपने प्रेम के प्रतीक स्वरूप अपनी स्वर्ण मुद्रिका जड़ित अंगूठी देते हुए आज्ञा लेकर हस्तिनापुर लौट गये। उन्ही दिनों वनविहार करते समय एक दिन कण्व ऋषि के आश्रम में ऋषि दुर्वासा आए। ऋषि दुर्वासा अपने क्रोधित स्वभाव और अप्रतिम सिद्धियो के लिए पौराणिक इतिहास में जाने जाते है। वह आश्रम पर पधारे लेकिन महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं रहा और उसने दुर्वासा ऋषि का आश्रम में यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने तो वास्तविकता न जानकर इसे अपना अपमान ही समझ लिया और क्रोधित हो कर आदत वश श्राप दे बैठे। उन्होंने शकुन्तला को श्राप दिया कि ‘जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूमने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।’ दुर्वासा ऋषि के इस भयंकर शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान तुटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने उसे श्राप का तोड़ बताते हुए कहा की, ‘यदि तुम्हारे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा, तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।’

महाराज दुष्यंत से विवाह कर लेने के बाद शकुन्तला गर्भवती थी। कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि भी तीर्थ यात्रा से लौट आये। जब वह लौट आये तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में सूचित कर दिया। इस बात पर महर्षि कण्व ने बड़े शांत भाव से कहा की, ‘पुत्री विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं माना जाता है। क्योकि अब विवाह के पश्चात तेरे पति का घर ही तेरा घर है।’ इतना कह कर महर्षि कण्व ने शकुन्तला को अपने कुछ शिष्यों के साथ सकुशल हस्तिनापुर भिजवा दिया।

लेकिन हस्तिनापुर के मार्ग में ही एक सरोवर तट पर आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह स्वरूप थी, वह सरोवर में ही कही गिर गई। ओर उस अंगूठी को सरोवर में गिरते ही एक मछली ने निगल लिया। शकुन्तला को आने वाले तूफान की आशंका तो हुई, लेकिन महाराज दुष्यंत से मिलने की खुशी में वह दुर्वासा का शाप तो मानो भूल ही गई।

आखिर कर महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर दिया। और ऋषि श्रेष्ठ की ओर से यह कहा की, ‘महाराज दुष्यंत शकुन्तला अब आपकी पत्नी है, ओर ऋषि श्रेष्ठ कण्व की अनुमति से आप इसे स्वीकार करें।’ लेकिन महाराज दुष्यंत तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शाप के प्रभाव से शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया, और उस पर उल्टा कुलटा होने का लाँछन लगा दिया।

हस्तिनापुर में हुए शकुन्तला के अपमान से ही आकाश में जोरों की बिजलीया कड़क उठी, और सब के सामने उसकी माता मेनका आकर उसे अपने साथ ले गई। लेकिन फिर एक दिन जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट से वह अँगूठी निकली। इस अंगूठी की पहचान होते ही उस मछुआरे ने अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। जब वह अंगूठी महाराज दुष्यंत के सामने पेश की गई, तो उस अँगूठी को देखते ही महाराज को तुरंत ही शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। आखिर कार महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला को सैन्य बल का प्रयोग कर बहुत ढुँढवाया, किन्तु शकुन्तला का कही पर पता नहीं चला।

लेकिन उन्ही दिनों में देवराज इन्द्र के निमंत्रण से देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती चले गये। उस संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर की ओर लौट रहे थे, तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के विचार को साथ लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ दिया था तथा वह बालक भी शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी।

उस बालक की वीरता देख कर दुष्यंत उसे गोद में उठाने के लिये ललचा उठे और वह बिना जान ही आगे बढ़े। लेकिन वह उसे उठा पाते तभी शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी की, ‘हे भद्र पुरुष आप इस बालक को न छुयें, अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।’ लेकिन यह सब सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को उस बालक की और आकर्षित होने से न रोक पाए, और उन्होंने बालक को अपनी गोद में उठा लिया। लेकिन तब उस सखी ने भी आश्चर्य से यह देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा अपने आप खुलकर धरती पर गिर गया है।

सखी को इस बात का पहले से ज्ञान था कि बालक को जब कभी भी उसके पिता अपनी गोद में उठाएंगे, वह काली डोर अपने आप खुलकर जमीन पर गिर जाएगी। सखी ने प्रसन्न हो कर वहा बिता समस्त वृतान्त शकुन्तला को कहकर सुनाया। इस वृतांत को सुनकर खुशी के मारे शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास दौडी चली आई। महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला को सामने आते ही पहचान लिया। उन्होंने अपने द्वारा किये गए कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना कि और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित हस्तिनापुर ले आये। महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस महान ओर तेजस्वी पुत्र का नाम था ‘भरत’

ओर बाद में वे भरत ही महान प्रतापी हस्तिनापुर सम्राट बने और उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष हुआ। यही वंश हमारे महाकाव्य ग्रंथ महाभारत की शरुआत से वर्णित है।

लेकिन अगर देखा जाये तो हमारा लिखित इतिहास यानी कि महाभारत की वृतात्मक कहानी तब से शास्त्र वर्णित है, जब से कुरु के वंश में शान्तनु का जन्म हुआ था। आगे के पात्रो की सिर्फ जानकारी और जलक मिलती है उनका कोई ठोस वृतांत मिलना मुश्किल है। वैसे हमारा महाभारत भी तो राजा शांतनु से ही शुरू होता है ओर इन्ही शान्तनु से गंगा नन्दन देवव्रत ( जो भविष्य में अपनी भीषण प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाये) उत्पन्न हुए थे। जिन्हें इतिहास में गंगापुत्र भीष्म ओर भीष्म पितामह भी कहा गया है। वेसे तो शांतनु से उनके दो ओर छोटे भाई थे, जिनका नाम चित्रांगद और विचित्रवीर्य था। ये दोनो भाई शान्तनु ओर सत्यवती की संतान थे।

पीता शान्तनु जब सत्यवती से मोहित हुए तब भीष्म ने ही उन्हें मिलाने का काम किया था। और पिता शान्तनु के विवाह के खातिर ही देवव्रत (कुमार भीष्म) ने सत्यवती को समजाते हुए भीष्म प्रतिज्ञा ली थी। क्योकि सत्यवती अपने पुत्रों को मिलने वाले अधिकारों के बारे में विवाह से पहेले से सोच रही थी। इन्ही अधिकारों को उन्हें सुरक्षित जताने के लिए उन्होंने राजगद्दी पर न बैठने ओर आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा ली। जिस प्रतिज्ञा के बोझ तले सारी उम्र वह अन्याय सहकर भी राजसेवा में दबे रहे।

कुछ वर्षों के बाद जब शान्तनु स्वर्गलोक चले गए तब भी प्रतिज्ञाबद्ध कुमार भीष्म ने अविवाहित ही रह कर, अपने भाई विचित्रवीर्य के राज्य का पालन किया। आप जानते ही होंगे कि भीष्म (देवव्रत) महाभारत के मूल पात्रों में से एक हैं। कुमार भीष्म देवी गंगा और महाराजा शांतनु के आठवे पुत्र थे। क्योकि भीष्म से पहेले जन्म लेने वाले सात पुत्रो को श्रापित जीवन से बचाने के लिए गंगा ने उन्हें पानी में बहा दिया था। लेकिन प्रतिज्ञा बध्ध शांतनु कुछ नही कर पाए, लेकिन भीष्म जन्म पर उन्होंने गंगा को रोक लिया। इस तरह भीष्म जीवित तो बच गए। लेकिन अपनी प्रतिज्ञा तुटते ही गंगा ने शांतनु को छोड़ दिया। ओर शिक्षा प्राप्त करने तक भीष्म गंगा के पास ही रहे। अपने पिता की खातिर दिये गये वचन के कारण इन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था। इन्हें अपनी मा गंगा से इच्छामृत्यु का वरदान भी प्राप्त था। और युध्ध विद्या में भी वे परशुराम के सामान थे इसलिए युद्धभूमि में भीष्म अजेय योद्धा थे।

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’

( Note :- इस विषय को पौराणिक तथ्यों और सुनी कहानियो तथा इंटरनेट और अन्य खोजबीन से संपादित माहिती के आधार पर लिखा गया है। और पौराणिक तथ्य के लेखन नहीं सिर्फ संपादन ही हो पाते हे। इसलिए इस संपादन में अगर कोई क्षति दिखे तो आप आधार के साथ एडमिन से सपर्क कर शकते ।)

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