महाभारत : दिव्यास्त्रो की प्राप्ति

हर कोई जानता था की युध्ध किसी भी हाल में अब नहीं टलने वाला है। क्योकि हस्तिनापुर की राजसभा में जो कुछ भी हुआ था और जो प्रतिज्ञा और श्राप उस सभा में दिए गए थे, उसके बाद वनवास ख़तम होते ही युध्ध का होना लगभग नियति बन चूका था। यह भी तय था की अगर युध्ध होता है, तो हसिनापुर की और से भीष्म पितामह और गुरु द्रोंण के साथ अंग राज कर्ण का विरोध पक्ष से लड़ना निश्चित था। अब इन सब महायोद्धाओ के रणभूमि में होते हुए हस्तिनापुर से युद्ध में जितना संभव नही था। ऐसे में कृष्ण ने अर्जुन को यह सलाह दी की वनवास के समय का वे सही से उपयोग करें। इस सुचना को ध्यान में रखकर वनवास के आरंभ से ही अर्जुन ने अपनी यात्रा का भी प्रारंभ कर दिया।

जब विरवर अर्जुन अपनी तपस्या के संकल्प के साथ उत्तराखंड के पर्वतों को पार करते हुये एक अपूर्व सुन्दर वन पहुचे तो उन्हें साधना के लिए यह स्थान सबसे उचित लगा। वहाँ के शांत वातावरण में उन्होंने महादेव की तपस्या आरंभ की। कई वर्षो की कठिन तपस्या से महादेव को भी प्रशन्न होकर अर्जुन को दर्शन देना आवश्यक हो गया। लेकिन अर्जुन की कामना वे अच्छे से जान चुके थे। सृष्टि का सबसे घातक शिव शस्त्र (पाशुपतास्त्र) की कामना लिए अर्जुन यह तपस्या कर रहा था। पाशुपतास्त्र पाने वाले को अपनी योग्यता सिद्ध करना आवश्यक होता है, इसलिए अर्जुन की परीक्षा करने स्वयम भगवन शिव किरात के वेष में अर्जुन के पास आये। एक असुर वहा पर शुकर का रूप धारण कर कुछ ब्राह्मणों के पीछे पड़ा हुआ था। उन ऋषिओ में से एक ने अर्जुन से रक्षा के लिए गुहार लगाई, तभी अर्जुन ने इसे अपना कर्तव्य समझ कर तुरंत अपना गांडीव उठाया। एक तरफ से ऋषिओ को एक और आने का निर्देश देते हुए अर्जुन ने अपने गांडीव से तीर छोड़ा। लेकिन अर्जुन ने देखा की एक ही समय में शुकर पर दो बाण से घात हुई और शुकर वही प्राण छोड़ गया। अर्जुन हैरान था क्योकि उसके बाण के साथ ही दूसरा बाण भी शुकर को भेद चूका था। दोनों ही ने शुकर को अपना आखेट बताया, अर्जुन ने भी उन्हें शुकर ले जाने से नहीं रोका। लेकिन शिव परीक्षा का यह अवसर नही छोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने बिना सिद्ध किये शुकर को लेने से मना कर दिया और अर्जुन को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। दोनों में लंबे समय तक युद्ध हुआ, लेकिन अर्जुन उन्हें परास्त नही कर पाए। अंत में उसी वक्त उन्होंने नारायण अस्त्र का प्रयोग किया। नारायण अस्त्र से किरात का वध हो यह अर्जुन नहीं चाहता था लेकिन युद्ध की चुनौती पूर्ण करना उसका कर्तव्य था। नारायण अस्त्र भी किरात के सामने विफल हो गया, तब अर्जुन का मन कांप उठा। उसे अपनी गलती का अहेसास हुआ। वह समज चूका था की नारायण अस्त्र शिव के सिवाय किसी के सामने विफल नही हो सकता था। उन्होंने उस किरात को बार बार देखा, उनके गले में वही हार माला थी जो आज ही अर्जुन ने शिवलिंग को अर्पण की थी। और अब नारायण अस्त्र का विफल होना।

अर्जुन अब समझ चुके थे, की उनके सामने और कोई नहीं साक्षात महादेव ही खड़े थे। वे तुरंत उनके चरणों में गिर गए और उनसे क्षमा भी मांगी। उन्होंने शिव को न पहेचान ने की भूल की उसकी क्षमा मांगी और शिव अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए। महादेव ने प्रशन्न होते हुए अर्जुन से कहा, “हे अर्जुन में तुम्हारी तपस्या और पराक्रम से अत्यंत प्रशन्न हु, और तुम्हे तपस्या के फलस्वरूप पाशुपतास्त्र प्रदान करता हु”। भगवान शिव इतना कहकर वहां से अंतरध्यान हो गये। उसके बाद अर्जुन अपने भाइओ के पास लौट रहे थे, तभी देवराज इंद्र उन्हें मिले। अर्जुन के मानस पिता देवराज इंद्र उसे अपने साथ इन्द्रलोक ले जाने आये थे। और उन्होंने कुछ दिन अर्जुन को स्वर्ग में रहेकर अस्त्र सस्त्र अभ्यास करने के लिए उन्हें निमंत्रण भी दिया।

अमरावती आने के निमंत्रण के कारण वहा से अर्जुन कुछ दिनों के लिए इन्द्रलोक जाने का सोच रहे थे। कुछ काल पश्चात् उन्हें लेने के लिये इन्द्र के सारथि मातलि वहाँ पहुँचे और अर्जुन को विमान में बिठाकर देवराज की नगरी अमरावती ले आये। इन्द्र के पास पहुँच कर अर्जुन ने अपने पिता को प्रणाम किया। देवराज इन्द्र ने कुछ दिन अर्जुन को अमरावती में ही रहकर अस्त्र शस्त्र चलाने की प्रयोग विधि शिखने और चलाने का अभ्यास करने हेतु रुकने के लिए कहा, जिसे सुनकर अर्जुन वहा रुके। देवराज इन्द्र ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर अपने निकट आसन भी प्रदान किया। वहा वरुण देव, यमराज, कुबेर, गंधर्व और सभी देवो ने दिव्य एवं अलौकिक अस्त्र शस्त्र प्रदान किये। अमरावती में रहकर अर्जुन ने देवताओं से प्राप्त हुये दिव्य और अलौकिक अस्त्र-शस्त्रों की प्रयोग विधि सीखे और उन अस्त्र-शस्त्रों को चलाने का अभ्यास करके उन पर महारत प्राप्त कर लिया।

एक दिन इन्द्र अर्जुन से बोले, वत्स तुम चित्रसेन नामक गन्धर्व से संगीत और नृत्य की कला भी सीख लो। चित्रसेन ने इन्द्र का आदेश पाकर अर्जुन को संगीत और नृत्य की कला में निपुण कर दिया। एक दिन जब चित्रसेन अर्जुन को संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे थे, वहाँ पर इन्द्र की अप्सरा उर्वशी आई और अर्जुन पर मोहित हो गई। अवसर पाकर उर्वशी ने अर्जुन से कहा, हे अर्जुन आपको देखकर मेरी प्रणय जागृत हो गई है, अतः आप कृपया मेरे साथ विहार करके मेरी प्रणय को शांत करें। लेकिन उर्वशी के इस प्रस्ताव को अर्जुन ने ठुकरा दिया। गुस्से के कारन उर्वसी ने अर्जुन को श्राप दे दिया। उर्वशी ने अर्जुन को नपुंसको जैसे व्यव्हार के कारण जीवन भर नपुंसक हो जाने का श्राप दिया था। उर्वशी के वचन सुनकर अर्जुन बोले, हे देवि एक बार आप श्राप देने से पहले कारन तो सुन लेती। मेने प्रस्ताव अस्वीकार किया क्योकि हमारे पूर्वज ने आपसे विवाह करके हमारे वंश का गौरव बढ़ाया था अतः पुरु वंश की जननी होने के नाते आप हमारी माता के तुल्य हैं। देवि मैं आपको प्रणाम करता हूँ। इतना कहकर अर्जुन उर्वशी के सामने जुके तब इंद्र देव भी वहा आये, उर्वशी ने देवराज से ही श्राप का तोड़ पूछा। क्योकि श्राप विफल नही हो शकता था और उर्वशी को भूल का आभास हो चूका था। उन्होंने अपने श्राप को एक वर्ष के लिए कम कर दिया और अर्जुन को अपनी इच्छा अनुसार यह वक्त तय करने का अधिकार भी दिया। इस तरह उन्होंने इस श्राप को वरदान में बदल दिया और वहाँ से चली गई। उर्वशी का यह शाप भी भगवान की ही इच्छा थी, यह शाप भी अज्ञातवास में उनके काम आने वाला था। एक वर्ष के अज्ञातवास के समय ही अर्जुन ने अपना पुरुषत्व त्याग दिया और अज्ञातवास पूर्ण होने पर उन्हें पुनः पुरुषत्व की प्राप्ति हुई।

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’

(Note :- इस विषय को पौराणिक तथ्यों और सुनी कहानियो तथा इंटरनेट और अन्य खोजबीन से संपादित माहिती के आधार पर लिखा गया है। और पौराणिक तथ्य के लेखन नहीं सिर्फ संपादन ही हो पाते हे। इसलिए इस संपादन में अगर कोई क्षति दिखे तो आप आधार के साथ एडमिन से सपर्क कर शकते।)

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