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कैसा कमाल करती है

ये ऑनलाइन वाली लाइट, देखो कैसा कमाल करती है,
चोरी छुपे से उलटा, क्या है…? यही तो सवाल करती है,

ये ऑनलाइन वाली लाइट, देखो कैसा कमाल करती है,
चोरी छुपे से उलटा, क्या है…? यही तो सवाल करती है,

जब हम होते है उनके इंतजार में लिली बत्ती को घूरे हुए,
ओर कमबख्त, होते है वो तो काम के पिंजरों मे पूरे हुए,

कह कर जाते है फिर बात करते है, फिलहाल जाते है,
घड़ाकर बेठ जाते है नजरे, लेकिन कहा जल्द आते है,

इतमिनान से समजे तो मसला कुछ ऐसा उलझ पड़ा है,
रात इंतजार में कटती है, सवेरा फरियाद लेकर खड़ा है,

इन इंतजार करने की हमारी आदतों का अब क्या करे,
इंतजार में वो आते नही, ओर इतमिनान में हमे पाते नही,

कुछ कहना है उनशे आप यू न जाने के बाद आया करो,
ओर आने के बात फिर बिना कुछ कहे यू न सताया करो,

~ सुलतान सिंह ‘जीवन’

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