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अपने महलों की बुलंदी

अपने महलों की बुलंदी पर न कर तू ग़ुरूर इतना
किसीके दिलमे घर बनाकर देख.

अपने महलों की बुलंदी पर न कर तू ग़ुरूर इतना
किसीके दिलमे घर बनाकर देख.

अपने आसमान की ऊँचाई पर बादल न इतरा इतना
किसी प्यासे की प्यास बुझाकर देख.

अपने अश्क के आईनेके सामने लुत्फ़ न उठा इतना
किसीके ख़ुशीओ की विरासत सजाकर देख

अपने प्यारो को देकर ख़ुशी न खुश हो इतना
किसी रोते हुऐ मुशाफिर को हँसाकर देख

~ रेखा पटेल ‘विनोदिनी’

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