Sunday Story Tale’s – आख़री ख़त

डियर आदि,

उपर तुम्हें जो ये ‘डियर’ लिखा है, वो भी मिटा देने को जी चाहता है… पर रहने ही दो, और कितना कुछ मिटा पाउंगी ?

तुम्हे ये खत मिला होगा तब तक शायद बहोत देर हो चुकी होगी… तुम्हारे लिए ! मेरे लिए तो ये मेरे फायदे की ही उतने वक्त में मै तुमसे दूर चली गई होउंगी… कंही बहोत दूर !

हां, ठीक ही पढ़ा है तुमने… जा रही हूँ मैं। ये सब कुछ छोड़ कर… इस खुदगर्ज दुनिया को, उन खोखले रिश्तों को, और तुम्हें भी !

नहीं… नहीं, मेरे बारे में आत्महत्या का ख्याल भी अपने मन में मत आने देना क्यूंकि तुम्ही कहते थे ना की मैं डरपोक हूँ ! तो फिर उस ख्याल से ही मेरी रूह काँप उठाना ही जायज़ है। और सच बताऊ, तो तुम्हे छोड़ कर जाने के पीछे भी एक डर ही है… प्यार का डर !

तुम्हे पता ही है की प्यार शब्द से ही मुझे घिन आती है ! जब मैंने पहलीबार तुम्हे ये बताया था तब तुम मुज पर कितना हसे थे…! और मेरी बात सुनने की जगह खुद ही मुझे सुनाने लगे। तुमने कहा था की, किसीको प्यार से डर या नफरत हो ही नहीं सकती… पर हाँ किसीको प्यार में पड़ने का डर जरुर हो सकता है ! और फिर मैंने भी अपनी गलती मान ले कर तुम्हारी बात को सही ठहराया था !

उस्सी शाम हमने बहोत सारी बातें की थी…! मुझे अभी भी याद है, नये घर में आने के बाद मैं कुछ ज्यादा बोल ही नहीं रही थी, और एक तुम थे जो बोलने- बतयाने के लिए मरे जा रहे थे ! सामन ठिक ठिक सेट कर लेने के बाद तुमने बात का दौर आगे बढ़ाते हुए कहा था, की ‘शायद तुम्हारे पास जुबां ही नहीं है !’ मुझे उस वक्त भी हंसी नहीं आई थी, आज भी नहीं आ रही ! पर उसके बाद जो हुआ उसे याद कर चेहरे पर एक मीठी सी जरुर आ जाती है ! मैंने कहा था, ‘ऐसा नहीं है की मेरे पास जुबां नहीं है… पर हमारे बिच बात करने जैसा कुछ नहीं है !’ और फिर तुमने कहा, ‘बात करने के विषय खोजने की ही जरूरत नहीं है… ये तो साँस लेने जैसा है… तुम्हारे बिना प्रयास किये भी वो हो ही जायगा।’ और फिर तो हमने जो बातें की थी… कब दोपहर से शाम और कब शाम से रात हो गई कुछ पता ही नहीं चला ! वैसे तो तुम्हे हर थोड़ी देर में भूख लग आती है, पर उस दिन तो हम दोनों ने अपनी बातों से ही पेट भर लिया था !

तुम्हे पता है आदि, वो बातें सिर्फ बातें नहीं थी। उस दिन पहेली दफ्फा मुझे ये मालूम हुआ की मेरे पास भी कहने को कितना कुछ है… पर मैं कह नहीं पाती थी, या कहना ही नहीं चाहती थी ! क्यूंकि मुझे हमेशां से लगता था की सामने वाले को मेरी बात सुनने से ज्यादा सलाहों की अपनी टोकरी मुज पर उड़ेलने मैं ज्यादा दिलचस्पी रखता है ! कुछ अलग तरीके से कहूं, तो मुझे कोई ‘अच्छा सुननेवाला’ ही नहीं मिला। पर उस दिन मेरी वो शिकायत भी तुमने दूर कर दी !

ऐसी तो और कई बातें हैं जिनके सामने तुम्हे शुक्रिया कहना भी छोटा लगेगा !
आदि, तुमने आज तक जो भी किया उसका मोल मेरे लिए कभी भी कम नहीं होगा ! एक अनाथ लडकी जिसकी दया खा कर किसी एन.जी.ओ. ने उसकी और उस जैसी कितनो की शादी तय करवाई थी ! पर किस्मत ने मुझे वंहा भी धोखा दिया ! इस लिए नहीं की सभी की बारात आई और सिर्फ मेरी ही नहीं आई… और मैं दुल्हन के लिबास मैं बेबस सी पुतली की तरह मंडप मैं बैठी पड़ी थी ! पर शायद इस लिए की उस दिन तुम मेरी जिंदगी मैं आये थे ! हाँ वैसे तो हम बचपन से ही दोस्त थे, पर उस दिन से तुम सिर्फ एक दोस्त नहीं रहे थे। जानती हूँ आसन नहीं रहा होगा तुम्हारे लिए, एक अनाथ का बिच मंडप मैं हाथ थामना। और वो भी मेरी शर्तो पर। मैंने तुमसे अकेले में पहली शर्त ही यही रखी थी की हम कभी शादी नहीं करेंगे, और तुमने बिना हिचकिचाए कह दिया था की साथ रहने के लिए खुश रहना जरूरी है, शादी करना नहीं… और तो और तुमने मुज से ये तक कहा था की अगर तुमसे मेरा मन भर जाए तो मैं जब चाहूँ तब तुम्हे बिना बताए चली जा सकती हूँ !

पहले तो जैसे लगा की जैसे कोई मेरी उस बेबस हालात का मजाक बना रहा है, पर जब तुमने एन.जी.ओ. वालो से मेरे लिए जूठ कहा की थोड़े ही दिन मैं हम कोर्ट मेरेज कर लेंगे, पर हाल फ़िलहाल हमे साथ जाने दें, तब लगा की तुम सिर्फ हवा में ही बातें नहीं कर रहे थे। और एक बात बताउं, मुझे गलत मत समजना। एक बार तो लगा था की तुम मुझसे सिर्फ अपनी हवस पूरी करना चाहते हो। पर एक बार फिर मैं गलत थी ! और उसकी तस्सली तो मुझे पहले दिन की बातों मैं ही करवा दी थी की, तुम तब तक आगे नहीं बढोगे जब तक मेरी मंजूरी ना हो !

उस दिन मुझे अहसाह हुआ की पुरे जिस्म को छुए बगैर ही, सिर्फ हाथ में हाथ रखकर सहेलाते हुए भी किसी की रूह हो छुआ जा सकता है ! शुक्रिया, ये खुबसुरत अहेसास करवाने के लिए !

आदि, हमने न तो शादी की थी, और नाही ‘लिव-इन रिलेशन’ में थे… हमारे बिच जो था वो क्या था, नहीं पता ! पर ये कुछ अलग जरुर था !

तुम काम पर जाते, मैं अपना काम निपटाती, न कभी बीवी की तरह तुम्हारा इंतजार करती, और ना कभी तुम पति की तरह मुज पर हक जताते ! और इस्से भी आश्चर्य वाली बात तो मुझे ये लगती थी की तुम पुरुष हो कर भी सिर्फ मेरे हाथ और जुल्फे सहला कर कैसे चला लेते थे ! मुझे अक्सर होता था की अगर ये आदमी चाहे तो एक पल में मुझे मसल कर रख सकता है, पर तुम्हारी वही शराफत तुम्हे सभी से अलग बनाती थी !

आदि मैं हमेशा ये सोचा करती थी की लोगो को इतना जल्दी प्यार कैसे हो जाता है ? और जैसे की तुम जानते ही हो की मुझे प्यार के नाम से ही चिड थी… पर अब मैं भी उन सब में से एक होती जा रही थी ! महज दो हफ्ते के साथ में तुमने मेरे दिलोदिमाग पर कब्ज़ा ले लिया था ! तुम्हारी वो बातें, वो मेरा हाथ अपने हाथों के बिच सेह्नाला, मेरे बालों में तुम्हारी उंगलियों का रास्ता बनाना… इन सभी की मुझे आदत हो रही थी… तुम्हारी आदत हो रही थी आदि !

हाँ, तुमसे प्यार होता जा रहा था ! और सिर्फ एक यही चीज़ हमारे बिच में सही नहीं थी ! और बस इसीलिए मेरा जाना जरूरी था…

एक बार फिर से शुक्रिया, मुझे डरपोक कह-कह कर मेरा डर खत्म करने के लिए. इतना तो तुम भी मुझे समज ही चुके होगे की तुम्हे ऐसे ही छोड़ कर जाना मेरे लिए आसन नहीं रहा होगा, और तुम ये भी अच्छे से जानते ही हो की मुझे सब से ज्यादा डर प्यार में पड़ने से लगता है ! इसीलिए जानती हूँ की तुम मुझे कभी रोकना नहीं चाहोगे ! पर फिर भी अगर तुम्हारे सामने मैंने ये बताया होता और अगर तुमने मुझे एकबार भी रुक जाने को कहा होता तो मैं कभी जा ही नहीं पाती. इसीलिए तुम्हें मेरा ये पहला और आखरी खत दिए जा रही हूँ ! और ये तो मैं खुद ये नहीं जानती की मैं कंहा जा रही हूँ, क्या करूंगी… पर मैं ये अच्छे से जान चुकी हूँ की मैं यंहा नहीं रहे पाऊँगी। एकबार फिर से शुक्रिया, मुझे समजने के लिए, मुझे आज़ाद रखने के लिए !

तुम्हे छोड़ जाने के पीछे तुम्हारा प्यार नहीं, प्यार न करने का मेरा डर है !

तुम्हारी…

– Mitra ❤

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Author: Sultan

Simple person with typically thinking and creative heart...

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