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जींदगी ओ जींदगी कीतने रुप तेरे

जींदगी ओ जींदगी कीतने रुप तेरे,
समजना पाया आजतक कोइ।
कभी मीलती है अपनी बनकर,
अभी अभी मीली अजनबी बनकर।
हरबार धोका होता है,
पहचान नही पाती तुम्हे।
कभी मन मीत जैसी, कभी प्यारी सहेली,
कभी बैगानो की तरह पेश आती जींदगी।
लगती कभी कोई गीत, कभी गजल, कभी सरगम,
कभी बनजाती वो बेसुरी पडघम जींदगी।
कभी खट्टी कभी मीठ्ठी, कभी नमकीन लगती है,
तो कभी नीम सी कडवी जींदगी।
कभी सुख का झोका कभी, दु:ख का दरिया बन जाती जींदगी।
‘ काजल’ को प्यारा तेरा हर रुप जींदगी,
तेरे संग संग चलुगी हरबार जींदगी।

– किरण पियुष शाह

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